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18 Jan 2017

नेता तुम ही हो कल के!

साभार - अखिलेश यादव (ट्विटर)
16.01.2017, उत्तर प्रदेश के इस दिन के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए ये तारीख हमेशा याद रखने वाली तारीख होगी. इस दिन ना केवल उन्हें पार्टी की कमान मिली बल्कि इसी दिन वो सारी लड़ाइयों को जीतते हुए उस मुकाम पर पहुंच गए जहां शायद उन्हें खुद उत्तर प्रदेश की सियासत के नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव नहीं पहुंचा सकते थे. मुलायम वो लड़ाई हारे जिसकी हार में भी उनकी जीत नजर आती है. कौन पिता नहीं चाहेगा कि बेटा उससे भी काबिल साबित हो जाए. अपनी सारी जिंदगी राजनीतिक पटखनी देने वाले मुलायम सिंह को बेटे की ओर से मिली ये पटखनी भी आराम देती करवट ही लग रही होगी.

दरअसल मुलायम सिंह यादव ने जिस राजनीतिक बिसात को बिछाया उसे समझना हमेशा से एक टेढ़ी खीर रहा है. हो सकता है कि ये आंकलन भी कल को गलत साबित हो लेकिन मुलायम सिंह यादव के घर से अखिलेश यादव के घर के बीच की दूरी दिनों तक पैदल पार करते करते उस राजनीतिक उठा पटक की धमक को कुछ महसूस तो साफ तौर पर किया. ये एक ऐसी कहानी है जिसमें अगर फिल्म बने तो सबकुछ मिलेगा. त्याग, प्रेम, समर्पण, चालाकी, ईमानदारी, बेइमानी, जलन और ना जाने क्या क्या. और तो और फिल्म का क्लाइमैक्स भी आम हिंदी फिल्म की तरह हैप्पी एंडिंग पर हुआ.

साभार - अखिलेश यादव (ट्विटर)
2016 में अखिलेश यादव अपनी ही पार्टी से बाहर हो जाते हैं और 2017 में उसी पार्टी के सर्वे-सर्वा भी. अगर सब कुछ मुमकिन है तो सिर्फ वहां जहां मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक दांव चलते हों. पूरी जिंदगी जीतने वाला पिता अगर अपने बेटे से हार जाए तो क्या वो दुखी हो सकता है? क्या देश के पीएम से लेकर पीएम बनाने वालों तक को गच्चा देने वाले मुलायम सिंह यादव इतने कच्चे हो सकते हैं कि अपने बेटे के दांव से हार जाएं? साहब, सब कुछ स्क्रिप्ट नहीं तो सबकुछ ऐसा भी नहीं था जिसे मुलायम जानते और समझते ना हों. हर अनुष्ठान की वेदि पर एक बलि होती है. यहां बलि राजनैतिक करियर की ले ली गई. किसके ये सब समझ रहे हैं. प्यार से कभी उन्हें चाचा भी कहा जाता था.

जो मुलायम ये कहते हैं कि अखिलेश उनकी नहीं सुनता, वो बेटे अखिलेश को उन्हीं को हराने पर आशीर्वाद दे देते हैं! अगर बेटे ने सरकार नहीं चलाई तो राजा का न्याय तो कहता कि बेटे को जिम्मेदारी का एहसास कराया जाता, लेकिन क्या ऐसा हुआ. बाप बेटे के सामने लोहा नजर आता रहा तो बेटा भी फौलाद बन गया. ये ठीक ऐसा ही है कि पिता ने जोरदार गेंद फेंकी, लेकिन बेटे ने छक्का मारकर गेंद को मैदान के बाहर कर दिया. पिता के चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी, क्योंकि उसने तो सिर्फ गेंद को खेलना सिखाया था, बेटा तो छक्का मारने लगा.

साभार - अखिलेश यादव (ट्विटर)
दरअसल मुलायम चाह के भी पार्टी में ऐसी पकड़ अखिलेश को नहीं दे सकते थे. अगर वो खुद पार्टी की कमान अखिलेश के हाथों सौंंपते तो वंशवाद से लेकर तमाम आरोप लगते. पार्टी में अखिलेश विरोधी मुलायम के कारण शायद चुप होते लेकिन बगावत की गुंजाइश खत्म नहीं होती. अब अखिलेश यादव नायक बनकर उभरे हैं. जिसने सीधा मुलायम सिंह यादव को हरा दिया हो उससे भला कौन लड़ेगा. इस वार में नेताजी का सिंहासन बस हिला लेकिन चाचा शिवपाल की राजनीति खत्म हो गई. वो राजनीति जिसके संघर्षों के किस्से खुद मुलायम कहते फिरते थे.

मुलायम की खासियत ही उनका दांव होता है. किसी को पता नहीं चलता कि क्या करेंगे. जिस दिन बेटे को अल्पसंख्यक वोट तोड़ने वाला बताया उसी रात जीत का आशीर्वाद भी दे दिया. शिवपाल को संघर्षों का साथी बताया, लेकिन शिवपाल को कमजोरी का एहसास भी करा दिया. अगर नेताजी चाहते तो एक एक विधायक को फोन करके अपने पास बुला सकते थे, लेकिन उन्होंने किसी को रोका तक नहीं. राजनीति में अक्सर जो दिखता है वही नहीं होता. और हुआ यही.

साभार - अखिलेश यादव (ट्विटर)
अखिलेश और मुलायम के घर के बीच में एक दरवाजा है. बिना घर से बाहर निकले ही दोनों एक दूसरे के यहां आ जा सकते हैं. वो दरवाजा कभी बंद नहीं होता, बस सरका दिया जाता है. यही हुआ. नेताजी दो नावों पर पांव रखना चाहते थे, उन्होंने रखा भी. एक नाव दिखती रही, दूसरी नहीं दिखी. और अब नेताजी ने दिखने वाली नाव को डूबने दिया. वो खुद तो उस ना दिखने वाली नाव पर सवार हैं. पर बाकि डूब रहे हैं, और कह रहे हैं कि अखिलेश, नेता तुम ही हो कल के...