रायपुर आने के साथ ही पहला काम किया कि जिस शिक्षाकर्मी आन्दोलन के बारे में फेसबुक पर लिख रहा था उसका जायज़ा लेने का। तो चल पड़ा उस आन्दोलन की ओर। पक्का पत्रकार तो हूँ नहीं इसलिए एक पेन, नोटपेड और अपने मोबाइल के साथ पहुँच गया वहां। बहुत देर तक सप्रे शाला मैदान में घूमता रहा। यही वो जगह है जहाँ इन आन्दोलन कर्मियों को शासन ने जगह दी है। अच्छा लगा ये देखकर कि हमारे यहाँ आन्दोलन को जगह तो दी जाती है। काफी देर तक घूमते रहा, भाषण सुनता रहा, नारों को सुनता रहा। फिर निकाला अपना मोबाइल और लगा फोटो खींचने। कुछ देर तक यही क्रम चलता रहा। पर जब अपनी नोटपेड पर घटनाओं को नोट करना शुरू किया तो कुछ लोगों का ध्यान गया। लोग मेरे पास आ गए और पूछने लगे की भैया कहाँ से हो। जब बताया की पत्रकारिता की पढ़ाई करता हूँ दिल्ली में तब उनके चेहरे पर एक चमक आ गई। आन्दोलन के अगुवाओं को बुलाया गया। बातचीत शुरू हो गई। उन्होंने बताया की राज्य सरकार ने उनसे वादा किया था कि उन्हें 6वां वेतनमान मिलेगा और उनका संविलियन किया जायेगा। पर सरकार अब इससे पीछे हट रही है। पूरे राज्य के 1.86 लाख शिक्षाकर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की है। सारे शिक्षाकर्मी धरना स्थल पर जमे हुए हैं। ना धूप की परवाह ना ठण्ड का डर है। केवल अपनी मांगो को मनवाना एकमात्र लक्ष्य है। अब तो उन्होंने टेन्ट लगवा लिया है। जो देखा वही बता रहा हूँ। आप भी देखें कि कैसे ये सब जमे हुए हैं।

विरोध का ये तरीका शायद अजीब लगे पर किया भी क्या जा सकता है। संकल्प लिया है की इस बार वोट जरुर डालेंगे। (निश्चित तौर पर उनके खिलाफ जो इनकी मांगों को नहीं मानेगा।) ये आन्दोलन कर्मी दिनभर यहीं रहते हैं। प्रदर्शन करते हैं। नाचते हैं। गाते हैं। पूछने पर बताते हैं कि अब यही तरीका बचा है। नंगाड़े बजाकर सांकेतिक प्रदर्शन भी किया है। (कुम्भकर्ण को भी इसी तरीके से उठाया जाता था।) लेकिन अभी तक सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा है। सरकार मस्त है। राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली के आन्दोलन को कवर करने में लगा हुआ है। फेसबुक पर ये लोग हैं नहीं। और क्षेत्रीय मीडिया अपने बुलेटिन में 1-2 शॉट दिखाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। तो क्या करें आन्दोलन तो जारी रखना ही है। कईयों की उम्मीद बंधी है इससे। ये नाचते हैं इस सरकार के खिलाफ जो इन्हें अपनी धुनों पर नचाती है। कभी चुनाव में तो कभी जन-गड़ना में। इनके चेहरे की हंसी देखिये। लोकतंत्र पर हंसी लगती है। आज शिक्षक किस भूमिका में है देखना चाहेंगे तो देखिये-

इतना सब अनुभव करके जब चलने का सोचा तो इनसे विदा लेने गया। इन्होंने कहा कि एक चाय तो पीते जाइये। मना किया तो कहा कि "शिक्षाकर्मी हैं सर कुछ खिला नहीं सकते पर चाय पिला सकते है। बढ़िया चाय पिलायेंगे अदरक वाली।" फिर मना नहीं कर पाया। चाय पीने चले तो देखा कि यहाँ तो पूरा बाजार सजा हुआ है। इस आन्दोलन से भी कईयों की रोजी रोटी चल रही है। सब्जी के ठेले लगे हैं। कपड़े भी बिक रहे हैं। चलती फिरती सोडा की दुकानें लगी हैं। चाय समोसे वाले भी अपने ग्राहक ढूंढ रहे हैं। सिगरेट वाले तो घूम घूम कर अपना सामान बेच रहे हैं। और हाँ पानी का तो सबसे बड़ा बाजार है। यहाँ तक की पानी वालों ने तो अपनी ब्रांडिंग भी कर दी है। पर एक बात जो अंत में बताना चाहता हूँ वो ये कि यह चाय भी एक कारण से पिलाई गई थी। जब तक चाय ख़त्म नहीं हुई यही चिंता होती रही कि कैसे इस आन्दोलन को आवाज़ मिले। कभी कभी ये शंका भी उत्पन्न होती थी के कहीं दिल्ली से सबक लेकर सरकार इन्हें भी ना कुचल दे। गिरफ़्तारी का डर भी बना हुआ है। पर जोश में कोई कमी नहीं है। सबकी आँखों में उम्मीद है के जल्द कुछ अच्छा होगा। चाय खत्म हो गई। इस बात के साथ विदा हुआ कि "देखिएगा सर अगर कुछ हो पाए तो।" मैने कहा चिंता ना करें जल्द ही अच्छा होगा। तब तो सर खूब फटाके फोड़ेंगे और आपको जरुर याद करेंगे।
तो इन सबको ध्यान में रखकर में भी अपने कर्तव्य की इतिश्री ही कर रहा हूँ। ब्लॉग पर घटना को बता दिया। और फेसबुक पर शेयर कर दूँगा। अगर आपमें से किसी को सही लगे तो सोशल मीडिया की ताकत दिखा दीजिये।