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9 Apr 2013

इस आग की तपिश को महसूस कीजिए




दुर्ग में जे के लक्ष्मी सीमेंट फैक्ट्री में आग लगने की खबर जब मिली तो उस वक्त मैं इसे एक दुर्घटना के रूप में ही ले रहा था। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया ये बात स्पष्ट होती गयी के ये केवल एक दुर्घटना नहीं है। इस आग को गांव वालों ने लगाया ये सुनकर हैरानी हुई, कारण भी अगले दिन के अखबारों में स्पष्ट हो गया कि छत्तीसगढ़ के इतिहास में ये किसी भी उद्योग के आग लगाने की पहली घटना थी। इससे पहले भी कई आंदोलन हुए हैं पर उनमें से किसी की भी परिणिती इस तरह की नहीं हुई है।
समय के साथ इस खबर पर प्रतिक्रियाएं भी आने लगीं। जिम्मेदारी तय की जाने लगी। मुख्यमंत्री ने पुलिस अधिकारियों पर अपना गुस्सा दिखाया। फैक्ट्री के प्रबंधन नें मजदूरों के खिलाफ शिकायत की, पुलिस ने भी पूरे क्षेत्र को छावनी में बदल लिया। कार्रवायी शुरू हई और एक-एक करके आस-पास के गांव से मजदूरों को ढूंढ़ कर, पकड़ कर गिरफ्तारी शुरू हो गयी। गांव के गांव से लोग भाग कर जाने लगे और पुलिस से बचते रहे।
लेकिन खबर केवल इतनी नहीं है, ये हमारा स्वभाव होता है कि हम किसी घटना पर प्रतिक्रिया तो दे देते हैं पर घटना के कारणों को समझना नहीं चाहते हैं। इस फैकट्री में आग जरूर मजदूरों ने लगाई हो पर वास्तविकता में इस आग से सबसे ज्यादा झुलन भी उन्हे ही हुई है। फैक्ट्री में आग लगने के बाद आरोपी बने यही मजदूर, फैक्ट्री जलने के बाद इन्ही का चूल्हा जलना बंद हुआ। अब तो ये अपने ही गांव को छोड़कर भागने पर मजबूर हैं। वैसे ये हमेशा ही होता आया है कि कारण कुछ भी हो भुगतता हमेशा से गरीब किसान या मजदूर ही है।
जे के लक्ष्मी सीमेंट फैक्ट्री में लगी इस आग के पीछे के कारणों को समझना भी जरूरी है। शुरूआत से ही इस मामले में गलती रही है, कंपनी ने अपने फायदे के लिए नियम को ताक पर रखा और गांववालों से भी वादा खिलाफी की। कंपनी को फैक्ट्री बनाने के लिए जिस गांव (सेमरिया) में जमीन आबंटित की गई वहां जमीन के दाम ज्यादा होने के कारण कंपनी ने दूसरे गांव (मलपुरी) में जमीन ले ली। इसके बाद कंपनी ने मलपुरी गांव में जन सुनवाई भी नहीं की जिससे न तो ग्रामीणों की आपत्ति का पता चला न ही उनके सुझावों का।
अब अगर बात करें इस हादसे की तो एक बात तो स्पष्ट है कि ये मजदूर इतने हिंसक कभी नहीं हो सकते अगर इन्हे बार-बार न सताया गया होता। फैक्ट्री लगी इनकी ज़मीन पर इस वादे के साथ कि परिवार से एक को नौकरी मिलेगी, पर हुआ क्या? नौकरी तो दिखाई नहीं दी केवल आश्वासन सुनाई दिए। सब्र की भी एक सीमा होती है, वो भी टूटी। नौकरी का वादा खोखला दिखाई देने लगा तो गांव वालों ने फैक्ट्री के सामने धरना दिया। अब गांधी के देश में गांधीवाद का रास्ता सफल कितना होता ये तो समझ नहीं आ रहा था। सब्र का बांध फिर टूटा और फिर जो हुआ उसका परिणाम था छत्तीसगढ़ का पहला हिंसक आंदोलन।
खैर कुल मिलाकर बात ये लगती है कि ये घटना एक त्वरित परिणाम नहीं है। एक कारण था जो ये सब घटा। अब वो कारण भड़काना रहा हो या फिर भड़कना पर जो भी हो ये एक हाथ की ताली नहीं है साहब। दूसरा हाथ शायद वो है जिससे सरकार अपना हाथ मिलाती है। बस मुझे तो एक बात समझ आ रही है कि पेट की आग बढ़ेगी तो ऐसी आग भड़केगी।

5 Mar 2013

संदर्भ: द अटैक्स ऑफ 26/11

फिल्म द अटैक्स ऑफ 26/11 एक ऐसी कहानी पर आधारित है जिसे सब जानते हैं। 26/11 के हमले के उपर कई डाक्युमेंट्री बन चुकीं हैं। ऐसे में रामगोपाल वर्मा ने इस फिल्म को बनाकर क्या नया दिखाया है यही बात खास है। रामगोपाल वर्मा का ये कहना कि इस फिल्म में उन्होनें भावनाओं को दिखाने की कोशिश की है। ये बात फिल्म देखकर सही भी लगती है। द अटैक्स ऑफ 26/11 देखने के लिए दर्शक के मन में उस घटना को जानने की उत्सुकता होनी चाहिए। इस फिल्म में घटनाओं से बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की गई है ना ही उन्हें काल्पनिक बनाया गया है।

इस फिल्म की कहानी के बारे में छुपा कर रखने लायक कोई बात नहीं है। ये एक ऐसी घटना है जिसके बारे में दर्शक को पहले से पता है। लेकिन दर्शक इस घटना के फिल्मांकन को देखने की सोच से फिल्म के प्रति सोचता है। राम गोपाल वर्मा ने इस विषय का चुनाव करके एक समझदारी भरा काम किया है। फिल्म की शुरूआत होती है मुंबई के असिस्टेंट कमिश्नर की भूमिका निभा रहे नाना पाटेकर के दृश्य से। नाना पाटेकर इस फिल्म की जान हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरीके से अजमल कसाब और उसके साथी मुंबई आकर आतंक का खेल खेलते हैं। पूरी फिल्म कसाब और उसके आतंक के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म के दूसरे भाग में जरूर नाना पाटेकर प्रभावी होते हैं।

फिल्म की खासियत की बात करें तो इसका संगीत और कैमरे का प्रयोग प्रभावी लगता है। कुछ दृश्यों में तो दर्शक झकझोर जाता है कि आतंक का ऐसा स्वरूप भी हो सकता है। स्टेशन पर चावल के साथ दाल के बजाए खून का मिलना हो या अस्पताल के बुजुर्ग को गोली मारना। ये दृश्य लोंगो को चोट करते हैं और उनकी संवेदना पर भी असर करते हैं। कसाब के पकड़े जाने के बाद नाना पाटेकर और उसका संवाद ज़बरदस्त है। जब नाना पाटेकर उसे एक कुत्ता कहता है तो दर्शकों की तालियां आती हैं जो दरअसल उस गुस्से के कारण हैं जो आतंक के कारण उपजा है। लेकिन नाना पाटेकर का प्रभाव अंत तक बना रहता है।

फिल्म के अंत में कसाब की फांसी भी दिखाई गई है पर उससे ज्यादा ताली पोस्टमार्टम रुम के दृश्य में आती हैं जहां कसाब बेबस और हारा हुआ नज़र आता है। कुल मिलाकर फिल्म में घटना के साथ-साथ उस समय की भावनाओं को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। घटना के प्रति उत्सुकता और भावनाओं के साथ उस हमले को फिर अनुभव करने के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है।

21 Jan 2013

प्रकाश झा से बातचीत...



प्रकाश झा हिन्दी फिल्म उद्योग का जाना माना नाम है। फिल्म निर्देशक के रूप में प्रकाश झा ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। प्रकाश झा कि फिल्मों का विषय हमेशा से आम आदमी से जुड़ा हुआ होता है। पिछले दिनों प्रकाश झा जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) आए थे वहीं उनसे बातचीत हुई।

प्र. फिल्में समाज को किस ओर ले जा रहीं हैं? और फिल्म बनाने का आपका उद्देश्य क्या है?

उ. फिल्में समाज को किसी ओर ले जाती हैं ऐसा मैं नहीं मानता। समय और सोसाइटी की प्रभाव फिल्मों पर पड़ता है। फिल्म केवल मनोरंजन का साधन है। आज सिनेमा में सबके लिए जगह है। शुद्ध मनोरंजन और उद्देश्यपरक फिल्मों दोनों के लिए जगह है।
      और फिल्म बनाने का मेरा उद्देश्य मेरे अंदर संचित ज्ञान को बताना है। यह मेरे लिए खुद को अभिव्यक्त करने का माध्यम है पर कमर्शियल सिनेमा होने के कारण कुछ समझौते किए जाते हैं।

प्र. आपकी फिल्मों में समस्याएं होती हैं पर समाधान नज़र नहीं आता?

उ. मैं भी एक आम आदमी के समान हूं जो चीज़ों को बता और दिखा सकता है पर समाधान नहीं बता सकता। समाधान इतने आसान होते तो शायद इन फिल्मों की आवश्यक्ता नहीं होती। समाधान इतने आसान नहीं हैं। फिल्में बनाकर मैं उत्तर खोजना दर्शकों पर छोड़ता हूं।

प्र. आपकी फिल्म के नायक भी कभी-कभी खलनायक नज़र आते हैं?

उ. मेरे विचार से नायक ही खलनायक होते हैं। उनके अंदर का खलनायक ही उन्हें नायक बनाता है।

प्र. “आरक्षण” और “चक्रव्यूह” जैसी फिल्मों भी आपने किसी का पक्ष नहीं लिया?

उ. मैं कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हूं। मैं सिर्फ एक फिल्म मेकर हूं। फिल्मों में मैं नहीं मेरे किरदार बोलते हैं। आप मेरे किरदारों को समझिए शायद आपको मेरा पक्ष समझ आ जाए।

प्र. आपकी फिल्मों में सामाजिक समस्याओं को उठाया जाता है। कोई खास वजह?

उ. मेरी फिल्मों में सामाजिक मुद्दे ना होकर सामाजिक आंदोलन होते हैं। मैं उसके प्रति चिंतित हूं जो कि समाज में हो रहा है। पर मुझे अपनी फिल्मों में दोनों पक्ष रखने पड़ते हैं।

प्र. “चक्रव्यूह” फिल्म के “मंहगाई” गाने पर हुए विवाद पर क्या कहना चाहेंगे?

उ. इस राष्ट्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होकर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। सेंसर बोर्ड ने पहले तो उन शब्दों को हटाने के लिए कहा फिर बाद में पूरा गाना ही हटाने के लिए कहा। हालांकि बाद में इस विवाद को सुलझा लिया गया। लेकिन एक फिल्म मेकर के रूप में ऐसी बातें बड़ा परेशान करती हैं। अब देखिए ना मायावती जी ने बिना फिल्म देखे ही “आरक्षण” को बैन कर दिया था।

प्र. फिल्म बनाने के लिए क्या आधार रखते हैं?

उ. मेरी फिल्मों का आधार खबरें होती हैं। फिर उस पर पढ़ा जाता है, लोगों से मिलकर उस पर बात की जाती है। लेकिन सबसे ज्य़ादा ज़रूरी किसी आइडिया का क्लिक करना है। बाद में उस आइडिए पर रिसर्च होता है और तब फिल्म तैयार की जाती है।

प्र. आपने राजनीति में भी हाथ आज़माया है, आगे की क्या योजना है?

उ. अब मेरा राजनैतिक जीवन समाप्त हो गया है। लोजपा (लोक जनशक्ति पार्टी) चुनना मेरी गलती थी। मैं कभी सांसद बनना चाहता था ताकि अपने क्षेत्र और आम जन की सेवा कर सकूं। मैं अब फिल्मों में ही खुश हूं।

24 Dec 2012

आवाज़ इन्हें भी चाहिए.

रायपुर आने के साथ ही पहला काम  किया कि जिस शिक्षाकर्मी आन्दोलन के बारे में फेसबुक पर लिख रहा था उसका जायज़ा लेने का। तो चल पड़ा उस आन्दोलन की ओर। पक्का पत्रकार तो हूँ नहीं इसलिए एक पेन, नोटपेड और अपने मोबाइल के साथ पहुँच गया वहां। बहुत देर तक सप्रे शाला मैदान में घूमता रहा। यही वो जगह है जहाँ इन आन्दोलन कर्मियों को शासन ने जगह दी है। अच्छा लगा ये देखकर कि हमारे यहाँ आन्दोलन को जगह तो दी जाती है। काफी देर तक घूमते रहा, भाषण सुनता रहा, नारों को सुनता रहा। फिर निकाला अपना मोबाइल और लगा फोटो खींचने। कुछ देर तक यही क्रम चलता रहा। पर जब अपनी नोटपेड पर घटनाओं को नोट करना शुरू किया तो कुछ लोगों का ध्यान गया। लोग मेरे पास आ गए और पूछने लगे की भैया कहाँ से हो। जब बताया की पत्रकारिता की पढ़ाई करता हूँ दिल्ली में तब उनके चेहरे पर एक चमक आ गई। आन्दोलन के अगुवाओं को बुलाया गया। बातचीत शुरू हो गई। उन्होंने बताया की राज्य सरकार ने उनसे वादा किया था कि उन्हें 6वां वेतनमान मिलेगा और उनका संविलियन किया जायेगा। पर सरकार अब इससे पीछे हट रही है। पूरे राज्य के 1.86 लाख शिक्षाकर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की है। सारे शिक्षाकर्मी धरना स्थल पर जमे हुए हैं। ना धूप की परवाह ना ठण्ड का डर है। केवल अपनी मांगो को मनवाना एकमात्र लक्ष्य है। अब तो उन्होंने टेन्ट लगवा लिया है। जो देखा वही बता रहा हूँ। आप भी देखें कि कैसे ये सब जमे हुए हैं।

बहुत देर तक इनके साथ घूमता रहा। और ये सब भी इस उम्मीद में मुझसे बात करते रहे जैसे मैं इस खबर को किसी बड़े चैनल पर चलवा दूंगा। ये सब मुझसे जो भी बात करते थे अंत में ये जरुर पूछते थे कि ऐसा क्या करें कि राष्ट्रीय चैनल भी इनको कवरेज दें। यहाँ मैं निरुत्तर हो जाता था। सोशल मीडिया के बारे में जितना सुना था वो दिल्ली में ही सुना था। पर इनको क्या बोलता कि ब्लॉग पर लिख दूंगा? या फेसबुक पर शेयर कर दूंगा। इतने में कुछ मीडिया के मित्र आ गए। पुराना परिचय है तो बातचीत शुरू। उन्होंने बताया कि चुनाव के समय सरकार ने वादा किया था, और अब चुनाव से पहले ये आन्दोलन कर रहे हैं। इसके पीछे राजनीती हो या इनकी मांग पर इतना तो पक्का है के इनकी हिम्मत बहुत है। रोज़ ट्रेन से रायपुर आते हैं और शाम को चले जाते हैं। महिलाएं छोटे छोटे बच्चों को लेकर आती हैं। अब देखिये कि इन बच्चों को लोकतंत्र की वास्तविक शिक्षा मिल रही है। क्या पता इनमें से कौन अभिमन्यु की तरह सब सीख रहा हो। विरोध के तरीके भी ऐसे अपनाये जा रहे हैं कि लोगों को आकर्षित किया जा सके। आखिर जो दिखेगा वही तो बिकेगा। लोग नाच गाकर विरोध कर रहे हैं।

विरोध का ये तरीका शायद अजीब लगे पर किया भी क्या जा सकता है। संकल्प लिया है की इस बार वोट जरुर डालेंगे। (निश्चित तौर पर उनके खिलाफ जो इनकी मांगों को नहीं मानेगा।) ये आन्दोलन कर्मी दिनभर यहीं रहते हैं। प्रदर्शन करते हैं। नाचते हैं। गाते हैं। पूछने पर बताते हैं कि अब यही तरीका बचा है। नंगाड़े बजाकर सांकेतिक प्रदर्शन भी किया है। (कुम्भकर्ण को भी इसी तरीके से उठाया जाता था।) लेकिन अभी तक सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा है। सरकार मस्त है। राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली के आन्दोलन को कवर करने में लगा हुआ है। फेसबुक पर ये लोग हैं नहीं। और क्षेत्रीय मीडिया अपने बुलेटिन में 1-2 शॉट दिखाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। तो क्या करें आन्दोलन तो जारी रखना ही है। कईयों की उम्मीद बंधी है इससे। ये नाचते हैं इस सरकार के खिलाफ जो इन्हें अपनी धुनों पर नचाती है। कभी चुनाव में तो कभी जन-गड़ना में। इनके चेहरे की हंसी देखिये। लोकतंत्र पर हंसी लगती है। आज शिक्षक किस भूमिका में है देखना चाहेंगे तो देखिये-

हाथ में भारत का झंडा अभी भी लोकतंत्र पर इनके विश्वास को दिखाता है। पुरे शरीर पर नारे लिखे कपड़े पहने हैं। शायद किसी जोकर की भांति लग रहे हों। पर जब व्यवस्था इनसे मजाक करे तो मजाकिया तो दिखना ही पड़ता है। पीछे अपने संगठन का बैनर लगा रखा है। "शिक्षक संघर्ष समिति। विकास खण्ड - कसडोल". इससे पता चला कि राज्य के सारे शिक्षाकर्मी संघ ने एक मंच तले ये आन्दोलन किया है। जरा इनके कपड़ों पर लिखी बातों को बताऊँ- "आमरण अनशन", "भूख की जंग में, हम सब संग में", "संविलियन और 6वां वेतनमान" और "शिक्षाकर्मी एकता जिंदाबाद" जैसे नारे लिखकर ये अपने साथियों को भी उत्साहित कर रहे हैं। और घूमा तो पाया कि यहाँ तो एक अलग ही दुनिया बस रही है। ये आन्दोलनकारी रोज़ के अख़बारों की तुलना कर रहे हैं कि किसने इनके आन्दोलन को कितनी कवरेज दी। कम कवरेज देखकर गुस्सा भी करते है, और कोसते भी हैं। इस बीच मंच से भजन गाने की आवाज़ आती है। ध्यान से सुनिए तो पता चलता है कि धुन भजन की है बोल बदल दिए गए हैं। इसी तरीके से फ़िल्मी गानों का रूपांतरण हुआ है। ऐसे भजन और गाने सुनकर अख़बार से ध्यान हटता है और तालियों से साथ दिया जाता है। एक से एक कवि बैठे हैं यहाँ तो। इनके टेन्ट में बैठा था तो पता चला कि नगर निगम ने अस्थाई शौचालय भी बना दिया है। तभी एक जनाब बोल पड़े कि विपक्षी पार्टी निगम में है इस कारण समर्थन कर रही है। टेन्ट में आन्दोलनकारियों के कपड़े सूख रहे थे। अब यही बसेरा है इनका। जब तक मांग पूरी ना हो जाये। 

इतना सब अनुभव करके जब चलने का सोचा तो इनसे विदा लेने गया। इन्होंने कहा कि एक चाय तो पीते जाइये। मना किया तो कहा कि "शिक्षाकर्मी हैं सर कुछ खिला नहीं सकते पर चाय पिला सकते है। बढ़िया चाय पिलायेंगे अदरक वाली।" फिर मना नहीं कर पाया। चाय पीने चले तो देखा कि यहाँ तो पूरा बाजार सजा हुआ है। इस आन्दोलन से भी कईयों की रोजी रोटी चल रही है। सब्जी के ठेले लगे हैं। कपड़े भी बिक रहे हैं। चलती फिरती सोडा की दुकानें लगी हैं। चाय समोसे वाले भी अपने ग्राहक ढूंढ रहे हैं। सिगरेट वाले तो घूम घूम कर अपना सामान बेच रहे हैं। और हाँ पानी का तो सबसे बड़ा बाजार है। यहाँ तक की पानी वालों ने तो अपनी ब्रांडिंग भी कर दी है। पर एक बात जो अंत में बताना चाहता हूँ वो ये कि यह चाय भी एक कारण से पिलाई गई थी। जब तक चाय ख़त्म नहीं हुई यही चिंता होती रही कि कैसे इस आन्दोलन को आवाज़ मिले। कभी कभी ये शंका भी उत्पन्न होती थी के कहीं दिल्ली से सबक लेकर सरकार इन्हें भी ना कुचल दे। गिरफ़्तारी का डर भी बना हुआ है। पर जोश में कोई कमी नहीं है। सबकी आँखों में उम्मीद है के जल्द कुछ अच्छा होगा। चाय खत्म हो गई। इस बात के साथ विदा हुआ कि "देखिएगा सर अगर कुछ हो पाए तो।" मैने कहा चिंता ना करें जल्द ही अच्छा होगा। तब तो सर खूब फटाके फोड़ेंगे और आपको जरुर याद करेंगे। 

तो इन सबको ध्यान में रखकर में भी अपने कर्तव्य की इतिश्री ही कर रहा हूँ। ब्लॉग पर घटना को बता दिया। और फेसबुक पर शेयर कर दूँगा। अगर आपमें से किसी को सही लगे तो सोशल मीडिया की ताकत दिखा दीजिये।

22 Oct 2012

ये रास्ता हमारा है...

"तुम अभी भी गुलाम हो" ये शब्द मेरे कानों में डालने वाला कोई और नहीं इस स्वतंत्र भारत का एक पुलिस वाला था । चीन के रक्षा मंत्री के भारत दौरे पर उनका क़ुतुब मीनार जाने का कार्यक्रम भी शामिल था और उनके इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटी थी दिल्ली पुलिस । 5 सितम्बर की  सुबह जब मैं अपने संस्थान जाने के लिए निकला तो सड़क पर पुलिस की भीड़ देखकर सोचा के शायद कोई दुर्घटना हो गई है पर दूर - दूर तक सिर्फ पुलिस वालों को देखकर लगा के किसी बड़े मंत्री का आगमन हो रहा है । मेरा ये अनुमान सच भी हुआ जब ज्ञात हुआ के चीन के रक्षा मंत्री इस मार्ग से जाने वाले हैं ।

खैर अब बात करूँ उस घटना की जिसके कारण मैं यह लेख लिख रहा हूँ । चीन के रक्षा मंत्री की सुरक्षा में लगी दिल्ली पुलिस सुबह से ही रोड पर यातायात को सुगम ( और शायद आम जन के लिय दुर्गम ) बनाने में जुटी हुई थी । सड़क के दोनों ओर तैनात पुलिस वाले हर आने जाने वाले वाहनों को रोक रहे थे, पैदल चल रहे लोगों को भाग कर जाने को कहा जा रहा था और बेचारे ठेले और गुमटियों वालों की तो शामत ही आ गई थी । एकाएक मेरे सामने चल रहे एक छात्र को पुलिस वाले ने भागकर जाने को कहा , लड़का तेज़ चलकर जा ही रहा था के पुलिस वाला उसे भद्दी गलियां देते हुए मारने लगा । कुछ समझ नहीं आया के उसका कसूर क्या था।

इस बीच चीनी रक्षा मंत्री का काफिला वहां से गुज़र गया , एक मिनट के इस कार्यक्रम के लिए अनेक लोग परेशान हुए । उस लड़के को रोक कर उसका नाम पता नोट किया गया । जब मुझे लगा के ये गलत हो रहा है तो मैंने पुलिस वालों से बात करने की कोशिश की । प्रारंभ में मुझे भी डराया गया पर कुछ झूठ और कुछ सच बोल कर में उनसे बात करने में सफल रहा। पूरी बातचीत में उन्होंने मुझे सुरक्षा व्यवस्था की दुहाई देकर अपने कृत्य को सही ठहराने की कोशिश की । पर इस बीच एक पुलिस हवलदार ने धीरे से कहा की आप कहाँ फस रहे हो हम तो अभी भी गुलाम हैं । मैं ये सुनकर अचंभित रह गया के कैसे एक पुलिस वाला ये सब बोल सकता है । पर ये इस स्वतंत्र राष्ट्र की सच्चाई है जहाँ ये देश अभी भी चंद पूँजीपतियों के हाथों में है, जहाँ ये देश उन लोगों के हाथों में है जिनके लिए लोग कुछ भी नहीं हैं।

अब आप सोच रहे होंगे की इन सारी बातों को अब लिखने का क्या फायदा। पर चूँकि कुछ दिन पहले ही हमने चीन से हार की यादों को फिर से ताज़ा किया और उसी क्रम में मुझे ये वाकया याद आ गया। इसलिए भी आपसे साझा कर रहा हूँ ताकि आप खुद सोच सकें के हमारा देश आखिर कौन चला रहा है। हमेशा ऐसी घटनाओं का शिकार हम ही क्यों बनें? क्यों इस देश की पुलिस जो कि हमारी रक्षक है, हमारी कम और इन तथाकथित विशिष्ट जनों की ज्यादा रक्षक दिखाई पड़ती है। कई सवाल हैं जिनके जवाब कोई नहीं देता।

शायद उस पुलिस वाले ने सच ही कहा कि हम अभी भी गुलाम हैं। हम गुलाम हैं इन व्यवस्थाओं के जो हमको ही परेशान करती हैं। हम गुलाम हैं उन लोगों के जो किसी ना किसी तरह इस देश की कमान सम्हाले हैं। हम गुलाम हैं अपने उस वास्तव में उन लोगों के जो हम पर राज करते हैं और गलती से हम भी इन्हें राजा बनाते हैं।

सोचिए कि कैसे इस स्थिति को बदलना है। सोच लें तो कुछ करिएगा भी वरना आप भी उन लोगों में ना गिने जाएँ जो केवल सोच सकते हैं। चलिए इसी उम्मीद में अपने शब्दों को समाप्त करता हूँ कि अब किसी और देश के "विशिष्ट" लोगों के लिए हमको हटाया नहीं जायगा। महोदय ये हमारा रास्ता है आपको भी चलने देंगे पर खुद को दबाकर नहीं।

- उत्कर्ष चतुर्वेदी।  

18 Jul 2012

अब किस रस्ते जाऊं ?

गुवाहाटी में जो कुछ भी हुआ वो एक शर्मनाक सच है आज का , हम चाहें जैसी भी बातें बना लें हम इस बात से नहीं मुकर सकते कि आज भी हम इस समाज में रहने वाली महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण का निर्माण नहीं कर पाए हैं । मेरा इस बात को लिखने का ये उद्देश्य नहीं है कि मैं फिर से उस घटना के प्रति आप लोगों कि जिज्ञासा बढाकर आपको प्रेरित करूं कि आप इसके विडिओ देखें और फिर उस भीड़ का हिस्सा बने जो घटना को देखती है अपने मन में अपराधियों को कोसती है और फिर चैनल बदलकर बैठ जाती है ।

मैं तो सिर्फ एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि हम या हमारी ही चुनी हुई इन सरकारों को ऐसे कितने और घटनाओं की आवश्यकता है जब वे इसने सबक लेकर प्रयास करें एक ऐसे वातावरण के निर्माण का जहाँ महिलाएं , बच्चे और बुज़ुर्ग सब निश्चिन्त होकर रह सकें । इस निश्चिंतता की प्रतीक्षा में और कितनी ही बेटिओं को इस तरह की घटना का सामना करना पड़ेगा ? कैसी व्यवस्था में रह रहें हैं हम ? जहाँ पुलिस को सूचित करने के स्थान पर लोग घटना के विडियो का निर्माण करते हैं । लोग तो भूल गए पर वो लड़की याद दिलाती रही के उनके घर में भी कोई बहन है, कोई माँ है, कोई पत्नी है । फिर भी उन पर कोई असर नहीं पढ़ा ।

बचपन में मेरी माँ मुझसे कहा करती थी कि बेटा उन रास्तों से मत जाना जहाँ लोग आते - जाते ना हों । पर यहाँ क्या हुआ वो लड़की तो बीच सड़क पर जहाँ लोगों की भरमार थी वहीँ निर्ममता का शिकार हुई । तो अब हम जाएँ तो जाएँ कहाँ से ? घटना राष्ट्रीय स्तर पर प्रकट हुई, लगा के अब कुछ अलग होगा और हुआ भी बिलकुल अलग , पहले तो उस लड़की का नाम सार्वजानिक कर दिया गया और फिर उसकी तस्वीरें भी । इस बात के दोषियों को क्या सजा मिली मात्र जाँच आयोग से अलग कर दिया गया। ऊपर से पुलिस का इस घटना पर बयान ऐसा के जैसे मीडिया ने एक मामूली सी घटना का राष्ट्रीयकरण कर दिया हो ।

यदि इस घटना पर श्री कृष्ण जी से पूछा जाता तो वे भी कह देते कि लाज तो मैं बचा लेता वो चीर हरण भी नहीं होता पर इस यू ट्यूब को कैसे रोकता जहाँ ये बार बार हो रहा है । उन वक्तव्यों को कैसे रोकूँ जो बार बार तीर के सामान चुभते हैं । आज इस पर सरकार क्या कर रही से ज्यादा चिंता राजनैतिक दलों के बयान की और यू ट्यूब पर देखी जानी वाली संख्या की है । हम ये अलाप रोज़ सुनते हैं, पर हम जो सुनना चाहते हैं वो ही नहीं सुन पाते कि दोषियों की गिरफ्तारी हुई, हम नहीं सुन पाते कि उन्हें सज़ा हुई और हम कभी नहीं सुन पाते के उन्होंने सज़ा पूरी भी की हो 

खैर ये सिर्फ़ न्याय व्यवस्था का प्रश्न नहीं बल्कि हमारे समाज की व्यवस्था का भी है कि हम कब सीखेंगे के हमें सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अपनों के लिए भी जीना सीखना होगा । अपनों से तात्पर्य तो आप समझ ही गए होंगे । देखिये कब वो दिन आता है जब किसी बच्चे को उसकी माँ इसलिए ना टोके कि वो किस तरह के रास्ते से होकर जा रहा है । 

इसी आशा और विश्वास के साथ सुझावों की प्रतीक्षा में ।

- उत्कर्ष चतुर्वेदी ।

13 Apr 2012

सत्यमेव जयते ?

टी. वी. पर आमिर खान के नए टी. वी. शो का विज्ञापन देखा... शो का नाम रखा गया है सत्यमेव जयते। 
पर क्या वास्तव में सत्यमेव जयते हो रहा है? सत्यमेव जयते का अर्थ है - सत्य की विजय ।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने की इतनी आज़ादी मिली हुई है के लोग इस देश के सेनाध्यक्ष को भी रिश्वत देने की बात कह दे रहे हैं , पर क्या यहाँ भी सत्यमेव जयते है? क्या रिश्वत देने वालो का सच सामने आया? क्या सेनाध्यक्ष की बातो या शिकायतों को बिना किसी राजनेतिक सोच के देखा या जांचा गया? उल्टा सेना के दिल्ली कूच और सेनाध्यक्ष को पद से हटाने की बात सामने आने लगी। पर क्या ये बाते इस पुरे मामले का सच थी? तो सच की विजय कहा हुई?

इन कुछ दिनों में देश में कोल घोटाले की हवा फैली हुई है... मेरे राज्य में भी ये बाते सर उठा रही है...
2 जी घोटाले के इतने बड़े हंगामे के बाद अब भी उसकी स्तिथि साफ नहीं हो पायी है...
कॉमन्वेल्थ खेलो में हुए घोटाले के बाद भी सुरेश कलमाड़ी जी के चेहरे की मुस्कान कायम  है...
क्या यहाँ हुआ सत्यमेव जयते? क्या इन सब घोटालो का सच सामने आया?

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी साहब भारत में अपनी निजी यात्रा पर आते हैं, हम उनका स्वागत भी करते हैं। पर क्या उनकी इस यात्रा के बाद भारत - पाकिस्तान के बीच जो व्यापारिक सम्बन्ध सुधरे हैं ठीक इसी तरह का सुधार  मुंबई हमलो की जाँच के बारे में नहीं होना चाहिये?
क्या इन  हमलो के असली गुनाहगारों का और बाकी ऐसी वारदातों में लिप्त लोगो का सच सामने नहीं आना चाहिये?

साथियों सवाल कई सारे हैं जिनके पीछे के सत्य की हम सबको प्रतीक्षा है, और ये उम्मीद भी है की ये सच बहुत जल्द और बिलकुल वास्तविक रूप में हमारे सामने होगा। ये उम्मीद और ये सहनशीलता ही हमारे अभी तक मजबूत रहने का राज़  है वर्ना इतने सारे घावों से तो अबी तक  हम टूट चुके होते...

चलिये इस शो के जरीये  ही हमें याद तो आया की हमारी इस संस्कृति का सूत्र वाक्य क्या है...
हम अभी भी सत्य की विजय की उम्मीद लगा कर बैठे हैं...
मानता हु के कुछ समय लगेगा पर हम सब पुरे विश्वास से फिर एक साथ कह सकेंगे - सत्यमेव जयते ।

इसी आशा और विश्वास के साथ फिर आप सभी के सुझावों की प्रतीक्षा में,

- उत्कर्ष चतुर्वेदी  

20 Mar 2012

ज़रा याद इन्हें भी कर लें...

23 मार्च 1931 वह दिन जब भारत गुलामी की ज़ंजीर में जकड़ा हुआ आजाद होने के लिए बेचैन था और इसी आज़ादी के लडाको को अंग्रेज़ सजा दे रहे थे । भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु ने इस देश के लिये अपना सर्वस्व  समर्पित कर दिया । पर क्या वाकयी हमको इनकी और इन जैसे अनेको की इस क़ुरबानी की कोई इज्ज़त भी है ? शायद नहीं वरना आज ये सिर्फ कुछ किताबो, सडको के नामो और चंद फिल्मो में सीमित ना रहकर हम सभी के विचारो में, व्यवहार में और जीवन में भी दिखलाई पड़ते ।

23 मार्च हर साल आता है और सरकारी कार्यक्रमों में सीमित रहकर हमारे लिये सिर्फ एक सामान्य दिन बन जाता है जब हम अपने सारे कम रोज़ की तरह करते है । आप सभी से मेरा सिर्फ एक सवाल है की अगर आपके घर में किसी को आने में कुछ देर हो जाए तो आपके मन में कैसे विचार आते है ? चिंता होती है ना ? तो फिर आपको तब चिंता क्यों नहीं हो रही जब जिन उद्देश्यों को लेकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी उन उद्देश्यों को आने में इतनी देर हो गई के अब तो हम उनको भूलते ही जा रहे हैं ।

भगत सिंह ने कहा था की आज़ादी का मतलब सिर्फ यूनियन जैक ( ब्रिटिश ध्वज ) के स्थान पर तिरंगे से न होकर पूरी व्यवस्था में परिवर्तन से होना चाहिए । आज हमारे लिये विकास का तात्पर्य क्या है ? क्या ऊँची - ऊँची  इमारतें, चमचमाती सड़के, फास्ट - फ़ूड केन्द्रों की श्रृंखला विकास का पर्याय है ? या फिर देश के आखिरी कोने में बसे किसी गरीब के सर पर छत , किसी भूखे के पास रोटी, और किसी लाचार की आँखों में चमक विकास है ? ये सवाल मैं आप पर छोड़ता हूँ ।

ये मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट है; भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रधांजलि देने का विचार आया और ये पोस्ट किया हूँ । समस्या यही है के केवल विचार आते हैं आज शब्दों में बदलने का प्रयास किया और आप सभी से उम्मीद की क्रिकेट, फिल्म और वाहनों की इस भीड़ में ज़रा याद इन्हें भी कर लें...

आप सभी के कमेंट्स और सुझावों की प्रतीक्षा मैं...

उत्कर्ष चतुर्वेदी...